70 साल के बुद्धिराम का रहस्य, 1 दिन के लिए बने जानवर... नाद से चारा गटकने का VIDEO वायरल
punjabkesari.in Thursday, Aug 20, 2026 - 07:34 AM (IST)
Maharajganj News: हमारे देश में आस्था और अंधविश्वास के बीच की लकीर अक्सर इतनी धुंधली हो जाती है कि इंसान समझ ही नहीं पाता कि सामने जो दिख रहा है, वह कोई ईश्वरीय चमत्कार है या महज दिमागी तमाशा। कुछ ऐसा ही हैरान करने वाला वाकया उत्तर प्रदेश के महराजगंज जिले के रुदलापुर गांव में सामने आया है, जहां नागपंचमी का दिन आते ही एक 70 साल के बुजुर्ग अचानक जानवर जैसी हरकतें करने लगते हैं।
महराजगंज के बुधराम नागपंचमी के दिन से अजीब हरकत करने लगे, वह जानवरों की तरह चारा खाने लगे, लोग उनकी पूजा कर रहे।
— Shivani Sahu (@askshivanisahu) August 19, 2026
लोग इसे परंपरा बता रहे हैं। pic.twitter.com/BpjcG2Xmpp
मिली जानकारी के मुताबिक, गांव के लोगों का दावा है कि रुदलापुर निवासी 70 वर्षीय बुद्धिराम के शरीर में साल 1975 से हर 3 साल पर, नागपंचमी के ठीक दिन महिषासुर का प्रवेश होता है। जैसे ही गांव के समय माता मंदिर में पूजा-पाठ शुरू होती है, बुद्धिराम का हाव-भाव और इंसानी व्यवहार पूरी तरह बदल जाता है। वह सामान्य खान-पान छोड़कर सीधे जानवरों की नाद की तरफ बढ़ते हैं और उसमें रखे भूसे, घास और पानी को बड़ी बेरहमी से खाने लगते हैं।
इस अजूबे को देखने के लिए आसपास के दर्जनों गांवों से हजारों लोगों की भीड़ उमड़ पड़ती है। कोई इसे महिषासुर का प्रकोप मानता है तो कोई इसे माता का चमत्कार। आलम यह होता है कि लोग बुद्धीराम को अपने हाथों से केला, लड्डू के साथ-साथ घास और भूसा तक खिलाते हैं। ग्रामीणों का तो यहां तक कहना है कि वे एक बार में 4-4 नाद का भूसा-पानी गटक जाते हैं। कई लोग तो यहां मन्नतें मांगने आते हैं और उनका दावा है कि मन्नत पूरी भी होती है।
अब सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि क्या वाकई किसी 70 साल के इंसान के शरीर में दैत्य या महिषासुर आ सकता है? या फिर यह सिर्फ एक ढोंग और बरसों से चला आ रहा इंसानी तमाशा है? वहीं चिकित्सा और विज्ञान के जानकारों की मानें तो इंसान का भूसा, कच्ची घास या मिट्टी जैसी चीजें खाना एक तरह का साइकोलॉजिकल डिसऑर्डर (जैसे PICA डिसऑर्डर) या गहरा अंधविश्वास हो सकता है। फिलहाल इस पूरे घटनाक्रम की कोई वैज्ञानिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन आस्था का चश्मा पहने लोगों को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। वे आज भी हर 3 साल में इस तमाशे को चमत्कार मानकर देखने पहुंचते हैं।

