सवाल पूछते ही गायब हुई बारात! UP में आधार और बायोमेट्रिक ने फेल की ठगों की प्लानिंग, सरकारी खजाने के बचे ₹427 करोड़!
punjabkesari.in Sunday, Jun 14, 2026 - 12:36 PM (IST)
Lucknow News: एक नकली दुल्हन, शादीशुदा दूल्हा जो कुंवारा बनकर आया और सवाल पूछते ही गायब हुई बारात- कन्नौज का यह मामला सरकारी मदद में धोखाधड़ी की आसानी से एक और नजीर बन सकता था, लेकिन इसके उलट यह घटना इस बात का सबूत बन गई कि प्रौद्योगिकी उत्तर प्रदेश में सरकारी लाभ पहुंचाने की व्यवस्था को कैसे बदल रही है। उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री सामूहिक विवाह योजना आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों की बेटियों की शादी में मदद करने वाली प्रमुख कल्याणकारी योजना है और इसके क्रियान्वयन में प्रौद्योगिकी की मदद से बड़ा डिजिटल बदलाव किया जा रहा है।
डिजिटल जांच से बची सरकारी खजाने की बड़ी रकम
ऑनलाइन आवेदन, आधार-आधारित पहचान सत्यापन, आय प्रमाणपत्रों की डिजिटल जांच और अलग-अलग डेटाबेस से मिलान अब धोखाधड़ी रोकने में अहम भूमिका निभा रहे हैं। वित्त वर्ष 2025-26 में समाज कल्याण विभाग ने लाभ देने से पहले ही 42,781 अपात्र आवेदकों की पहचान कर उन्हें योजना से हटा दिया। चूंकि हर जोड़े को एक लाख रुपए की मदद मिलती है, ऐसे में इस प्रक्रिया से सरकारी खजाने से 427.81 करोड़ रुपए का गलत भुगतान होने से बचा। कल्याणकारी योजनाओं के क्रियान्वयन से जुड़े अधिकारियों के लिए यह आंकड़ा इस बात का सबसे मजबूत संकेत बनकर उभर रहा है कि प्रौद्योगिकी कैसे शासन को बेहतर बना सकती है।
तकनीक से आई पारदर्शिता, मंत्री असीम अरुण ने जताया भरोसा
समाज कल्याण राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) असीम अरुण ने एक न्यूज एजेंसी से कहा कि मुख्यमंत्री सामूहिक विवाह योजना मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सोच पर आधारित एक कल्याणकारी पहल है। यह वास्तव में जरूरतमंद परिवारों के लिए है। पहले कभी-कभी गड़बड़ियों की खबरें आती थीं लेकिन प्रौद्योगिकी के इस्तेमाल से हम धोखाधड़ी को प्रभावी ढंग से रोक पाए हैं। इससे योजना अधिक पारदर्शी और जवाबदेह बनी है। उन्होंने कहा कि अगर आप हिसाब लगाएं, तो सरकार इस योजना के तहत हर पात्र जोड़े को एक लाख रुपए देती है। पिछले साल 42,781 अपात्र आवेदकों को हटाकर हमने 427.81 करोड़ रुपए व्यर्थ खर्च होने से बचाए।
आईरिस और बायोमेट्रिक जांच से फेल हुआ ठगी का प्रयास
कन्नौज की घटना नई व्यवस्था की ताकत दिखाती है। अधिकारियों के अनुसार, एक शादीशुदा व्यक्ति ने सामूहिक विवाह कार्यक्रम में नकली दुल्हन पेश कर लाभ लेने की कोशिश की। तकनीकी जांच और रिकॉर्ड मिलान में गड़बड़ी पकड़ी गई, जिसके बाद इसमें शामिल लोग समारोह से पहले ही कथित तौर पर फरार हो गए। विभाग के अधिकारियों का कहना है कि ऐसी घटनाएं ध्यान तो खींचती हैं, लेकिन बड़ी बात उन हजारों मामलों का पकड़ा जाना है, जो अंतिम चरण तक पहुंचने से पहले ही रोक दिए गए। विभागीय अधिकारियों के अनुसार, राज्य की डिजिटल सत्यापन व्यवस्था अब आवेदकों की कई स्तरों पर जांच करती है। इसमें आंखों की पुतली यानी आईरिस और बायोमेट्रिक जांच, आधार सत्यापन, आय प्रमाणपत्र का ऑनलाइन सत्यापन और लाभार्थियों के आंकड़ों का मिलान शामिल है। इससे वास्तविक लाभार्थियों और योजना का गलत फायदा उठाने की कोशिश करने वालों के बीच अंतर करना आसान हुआ है।
ऐसे खर्च होते हैं योजना के एक लाख रुपए
समाज कल्याण विभाग के उप निदेशक आर. पी. सिंह के मुताबिक, वित्त वर्ष 2025-26 में राज्य में इस योजना के तहत 76,522 पात्र जोड़ों के विवाह कराए गए। सत्यापन के बाद इन्हें सहायता पाने के योग्य पाया गया। योजना के तहत हर जोड़े को एक लाख रुपये की मदद मिलती है। इसमें 60,000 रुपए सीधे बैंक खाते में भेजे जाते हैं, 25,000 रुपए विवाह से जुड़ी सामग्री के लिए दिए जाते हैं और 15,000 रुपए कार्यक्रम आयोजन पर खर्च होते हैं। अधिकारियों का कहना है कि डिजिटल निगरानी का असली महत्व केवल धन बचाने में नहीं, बल्कि कल्याणकारी योजनाओं के क्रियान्वयन में भरोसा बढ़ाने में है।
पीलीभीत शादियों में सबसे आगे, ये हैं योजना की जरूरी शर्तें
विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि जब अपात्र आवेदक हट जाते हैं तो संसाधन उन लोगों तक पहुंचते हैं जिन्हें सच में मदद की जरूरत है। जिलावार आंकड़े भी इस योजना के दायरे को दिखाते हैं। पीलीभीत में 2025-26 में इस योजना के तहत सबसे अधिक 4,207 विवाह दर्ज किए गए। इसके बाद बिजनौर में 3,071 और महराजगंज में 3,070 शादियां हुईं। योजना के लिए दुल्हन का उत्तर प्रदेश की निवासी होना, परिवार की वार्षिक आय 3 लाख रुपए से कम होना और महिला के लिए 18 वर्ष और पुरुष के लिए 21 वर्ष आयु सीमा का होना जरूरी है। अविवाहित, विधवा और तलाकशुदा महिलाएं पात्र हैं। निराश्रित महिलाओं, विधवाओं की बेटियों और दिव्यांग लड़कियों को प्राथमिकता दी जाती है।
लोक प्रशासन में बड़ा बदलाव, एल्गोरिदम से तय हो रहे लाभार्थी
भारत में सरकारें कल्याणकारी खर्चों की निगरानी के लिए प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल बढ़ा रही हैं। ऐसे में उत्तर प्रदेश की सामूहिक विवाह योजना लोक प्रशासन में आ रहे बड़े बदलाव की झलक देती है, जहां एल्गोरिदम, डेटाबेस और डिजिटल सत्यापन अब बजट और लाभार्थियों जितने ही अहम होते जा रहे हैं। जो योजना जोड़ों को नया जीवन शुरू करने में मदद देने के लिए बनाई गई है, उसके लिए इस वर्ष शायद सबसे अहम आंकड़ा कराए गए विवाहों की संख्या नहीं, बल्कि वह 427.81 करोड़ रुपए हैं जो गलत हाथों में जाने से बच गए।

