पर्सनल लॉ से ऊपर हैं पॉक्सो और PCMA! बाल विवाह पर इलाहाबाद HC का ऐतिहासिक फैसला, मुस्लिम पक्ष की दलील खारिज
punjabkesari.in Thursday, Jul 09, 2026 - 09:46 AM (IST)
Prayagraj News: इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि विवाह की आयु के रूप में किशोरावस्था की शुरुआत को मान्यता देने वाला मुस्लिम पर्सनल लॉ, बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम (PCMA) और यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण (पॉक्सो) अधिनियम जैसे कानूनों को निष्प्रभावी नहीं कर सकता। अदालत ने कहा कि ये कानून बच्चों के साथ यौन संबंध को अपराध मानते हैं।
न्यायमूर्ति जे.जे. मुनीर और न्यायमूर्ति अचल सचदेव की खंडपीठ ने कहा कि धर्म की परवाह किए बिना देश के प्रत्येक नागरिक के लिए विवाह की न्यूनतम आयु वही होगी, जो बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम में निर्धारित की गई है। खंडपीठ ने ये टिप्पणियां पुलिस और चाइल्डलाइन की बचाव टीम पर कथित हमला करने तथा उनके काम में बाधा डालने के आरोप में दर्ज प्राथमिकी को रद्द करने का अनुरोध करने वाली रुबी और 18 अन्य लोगों की याचिका को खारिज करते हुए कीं। बचाव दल ने बुलंदशहर जिले में 16 वर्षीय मुस्लिम लड़की का प्रस्तावित विवाह रुकवाने के लिए हस्तक्षेप किया था, जिसके बाद उस समय हमला किया गया।
याचिकाकर्ताओं की ओर से अदालत में दलील दी गई कि शरीया कानून के तहत लड़की के किशोरावस्था की दहलीज में कदम (आमतौर पर 15 वर्ष की आयु) रखने के बाद ही उसका विवाह किया जा सकता है। उन्होंने दलील दी कि बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम, 2006 (PCMA) के प्रावधान विवाह से संबंधित उनके व्यक्तिगत कानून (पर्सनल लॉ) को प्रभावित नहीं करते। अदालत ने हालांकि इस दलील को खारिज कर दिया। खंडपीठ ने कहा कि कोई भी व्यक्तिगत कानून, बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम (PCMA) के तहत बाल विवाह पर लगाए गए प्रतिबंध या पॉक्सो अधिनियम के वैधानिक प्रभावों को निष्प्रभावी नहीं कर सकता।
खंडपीठ ने कहा कि अगर 18 वर्ष से कम आयु के व्यक्ति के विवाह की अनुमति दी जाती है, तो विवाह और यौन संबंधों के परस्पर जुड़े होने के कारण यह स्थिति पॉक्सो अधिनियम के उल्लंघन को वैधता प्रदान करने जैसी होगी। अदालत ने बचाव दल के साथ कथित तौर पर अभद्रता, धमकी और हमला किए जाने तथा टीम के सदस्यों को अपनी जान बचाने के लिए मजबूर होने संबंधी विवरण वाली प्राथमिकी को रद्द करने से इनकार करते हुए कहा कि पीड़िता को बचाव दल की देखरेख और संरक्षण से जबरन ले जाया गया था, जिसके बाद अंततः उसे फिर से बचाया गया। प्रथम दृष्टया यह सरकारी कर्मचारी को उसके कर्तव्य के निर्वहन से रोकने का मामला बनता है। प्राथमिकी में जिन अन्य अपराधों का उल्लेख है, उनकी भी गहन जांच आवश्यक है। अदालत ने एक जुलाई को याचिका खारिज करते हुए कहा कि प्राथमिकी को रद्दे करने करने का कोई उचित आधार नहीं है।

