Muharram 2021: आखिर क्यों मनाते हैं मुहर्रम, जानिए इसके पीछे की कहानी

punjabkesari.in Friday, Aug 20, 2021 - 10:33 AM (IST)

लखनऊः मुहर्रम इस्लाम धर्म में विश्वास करने वाले लोगों का एक प्रमुख त्यौहार है। इस माह की उनके लिए बहुत विशेषता और महत्ता है। इस्लामिक कैलेंडर के अनुसार मुहर्रम हिजरी संवत का प्रथम मास है। मुहर्रम इस्लामी साल का पहला महीना होता है। इसे हिजरी भी कहा जाता है। हिजरी सन की शुरूआत इसी महीने से होती है। इतना ही नहीं इस्लाम के चार पवित्र महीनों में इस महीने को भी शामिल किया जाता है। अल्लाह के रसूल हजरत मुहम्मद (सल्ल.) ने इस मास को अल्लाह का महीना कहा है। मुहर्रम के बारे में जानने के लिए हमें इतिहास के पन्नों को देखना पड़ेगा, जब इस्लाम में खिलाफत यानी खलीफाओं का शासन था।

क्यों मनाते है मुहर्रम ?
दरअसल इराक में यजीद नामक जालिम बादशाह था जो इंसानियत का दुश्मन था।हजरत इमाम हुसैन ने जालिम बादशाह यजीद के विरुद्ध जंग का एलान कर दिया था।मोहम्मद-ए-मस्तफा के नवासे हजरत इमाम हुसैन को कर्बला नामक स्‍थान में परिवार व दोस्तों के साथ शहीद कर दिया गया था। जिस महीने में हुसैन और उनके परिवार को शहीद किया गया था वह मुहर्रम का ही महीना था। उस दिन 10 तारीख थी, जिसके बाद इस्‍लाम धर्म के लोगों ने इस्लामी कैलेंडर का नया साल मनाना छोड़ दिया। बाद में मुहर्रम का महीना गम और दुख के महीने में बदल गया।
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कौन हैं शिया मुस्लिम?
इस्लाम की तारीख में पूरी दुनिया के मुसलमानों का प्रमुख नेता यानी खलीफा चुनने का रिवाज रहा है। ऐसे में पैगंबर मोहम्मद साहब के बाद चार खलीफा चुने गए। लोग आपस में तय करके किसी योग्य व्यक्ति को प्रशासन, सुरक्षा इत्यादि के लिए खलीफा चुनते थे। जिन लोगों ने हजरत अली को अपना इमाम (धर्मगुरु) और खलीफा चुना, वे शियाने अली यानी शिया कहलाते हैं। शिया यानी हजरत अली के समर्थक। इसके विपरीत सुन्नी वे लोग हैं, जो चारों खलीफाओं के चुनाव को सही मानते हैं।
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पहनते हैं काले कपड़े 
मुहर्रम माह के दौरान शिया समुदाय के लोग मुहर्रम के 10 दिन काले कपड़े पहनते हैं।वहीं अगर बात करें मुस्लिम समाज के सुन्नी समुदाय के लोगों की तो वह मुहर्रम के 10 दिन तक रोज़ा रखते हैं। इस दौरान इमाम हुसैन के साथ जो लोग कर्बला में श‍हीद हुए थे उन्‍हें याद किया जाता है और इनकी आत्‍मा की शांति की दुआ की जाती है।
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क्या है ताजिया ?
ये शिया मुस्लिमों का अपने पूर्वजों को श्रद्धांजलि देने का एक तरीका है। मुहर्रम के 10 दिनों तक बांस, लकड़ी का इस्तेमाल कर तरह तरह से लोग इसे सजाते हैं और 11वें दिन इन्हें बाहर निकाला जाता है। लोग इन्हें सड़कों पर लेकर पूरे नगर में भ्रमण करते हैं सभी इस्लामिक लोग इसमें इकट्ठे होते हैं। इसके बाद इन्हें इमाम हुसैन की कब्र बनाकर दफनाया जाता है। एक तरीके से 60 हिजरी में शहीद हुए लोगों को एक तरह से यह श्रद्धांजलि दी जाती है।

आपको बता दें की मुहर्रम को कोई त्‍यौहार नहीं है बल्कि मातम मनाने का दिन है। जिस स्‍थान पर हुसैन को शहीद किया गया था वह इराक की राजधानी बगदाद से 100 किलोमीटर दूर उत्तर-पूर्व में एक छोटा-सा कस्बा है। मुहर्रम महीने के 10वें दिन को आशुरा कहा जाता है। मुहर्रम के दौरान जुलूस भी निकाले जाते हैं।
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क्या करते हैं जुलूस में?
इस दिन को लोग करबला के खूनी युद्ध पर भाषण सुनते हैं, संगीत से बचते हैं, और शादी-विवाह जैसे खुशहाल अवसरों पर नहीं जाते हैं। मुहर्रम के 10वें दिन, वो रंगीन बैनरों और बांस-और-कागज के शहीद चित्रणों के साथ सड़कों पर उतरते हैं। इस जुलूस के दौरान, वे नंगे पैर चलते हैं और विलाप करते हैं। कुछ लोग अपने आपको खून निकालने तक कोड़े भी मारते हैं जबकि कुछ लोग नाचकर करबला के युद्ध का अभिनय करते हैं।


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Content Writer

Tamanna Bhardwaj

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