मकर संक्राति के दिन यहां लगता है आशिकों का मेला, जानिए क्या है इतिहास

Sunday, January 14, 2018 4:47 PM
मकर संक्राति के दिन यहां लगता है आशिकों का मेला, जानिए क्या है इतिहास

बांदाः  मकर संक्रांति का पर्व यूं तो देश के हर हिस्से में मनाया जाता है, लेकिन बुन्देलखण्ड के बांदा में इसे कुछ अलग ही अंदाज में मनाया जाता है। इस मौके पर केन नदी के किनारे भूरागढ़ दुर्ग में आशिकों का मेला लगता है। प्रेम को पाने की चाहत में लोग यहां आकर मन्नते मांगते हैं। कहा जाता है कि अपने प्राणों की बलि देने वाले नट महाबली के प्रेम मन्दिर में खास मकर संक्राति के दिन हजारों जोड़े विधिवत पूजा अर्चना करने पहुंचते हैं। हर साल इस किले के नीचे बने नटबाबा के मन्दिर में मेला भी लगता है। जिसमें दूर-दूर से श्रद्धालु आते हैं।

प्रेमी-प्रेमिकाएं मांगते हैं मन्नतें 
इस मन्दिर में विराजमान नटबाबा भले इतिहास में दर्ज न हों, लेकिन बुन्देलियों के दिलों में नटबाबा के बलिदान की अमिट छाप है। ये जगह आशिकों के लिए किसी इबादतगाह से कम नहीं है। मकर संक्रांति के मौके पर शादीशुदा जोड़े यहां आशीर्वाद लेने आते हैं तो सैकड़ों प्रेमी प्रेमिकाएं अपने मनपसंद साथी के लिए यहां मन्नत मांगते हैं।
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जानिए क्या है मान्यता 
मान्यता है कि 600 वर्ष पूर्व महोबा जनपद के सुगिरा के रहने वाले नोने अर्जुन सिंह भूरागढ़ दुर्ग के किलेदार थे। यहां से कुछ दूर मध्यप्रदेश के सरबई गांव के एक नट जाति का 21 वर्षीय युवा बीरन किले में ही नौकर था। किलेदार की बेटी को इसी नट बीरन से प्यार हो गया और उसने अपने पिता से इसी नट से विवाह की ज़िद की।  लेकिन किलेदार नोने अर्जुन सिंह ने बेटी के सामने शर्त रखी। अगर बीरन नदी के उस पर बांबेश्वर पर्वत से किले तक नदी सूत (कच्चा धागे की रस्सी) पर चढ़कर पार कर किले आ जाए तो उसकी शादी राजकुमारी से कर दी जाएगी। 
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इस तरह हुआ प्रेम कहानी का अंत 
प्रेमी नट ने ये शर्त स्वीकार कर ली और ख़ास मकर संक्रांति के दिन प्रेमी नट सूत में चढ़कर किले तक जाने लगा। प्रेमी नट ने सूत पर चलते हुए नदी पार कर ली, लेकिन जैसे ही वह भूरागढ़ दुर्ग के पास पहुंचा, किलेदार नोने अर्जुन सिंह ने किले की दीवार से बंधे सूत को काट दिया। नट बीरन ऊंचाई से चट्टानों में गिर गया और उसकी वहीं मौत हो गई। 
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माना जाता है महाबली का सिद्ध मंदिर
किले की खिड़की से किलेदार की बेटी ने जब अपने प्रेमी की मौत देखी तो वह भी किले से कूद गई। वहीं उसी चट्टान में उसकी भी मौत हो गई। जिसके बाद किले के नीचे ही दोनों प्रेमी युगल की समाधि बना दी गई जो बाद में मंदिर में बदल गई। आज ये नट महाबली का सिद्ध मंदिर माना जाता है। 



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